7 नवम्बर 1966, हिंदुस्तान के इतिहास का वो काला अध्याय जिसके बारे में आज की पीढ़ी बहुत ही कम जानती है | इसी दिन तत्कालीन प्रधानमन्त्री इंदिरा गांधी ने 5000 हिन्दुओं का कत्लेआम करवा दिया था , और उनकी लाशों को भी ठिकाने लगवा दिया था |

आइये , अब आपको बताते हैं इंदिरा और तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने आखिर ऐसा क्यों किया | भारत देश में गाय की पूजा की जाती है , उसे माँ का दर्जा दिया गया है , लेकिन हिन्दू विरोधी कांग्रेस कभी इस बात को पचा नहीं पायी है |

1966 में, हिंदू संगठनों ने भारत में गायों के वध पर प्रतिबंध लगाने की मांग के लिए आंदोलन किया|
इस आन्दोलन में हिन्दुओं के तमाम बड़े संगठन शामिल थे | लेकिन कांग्रेस सरकार इस मांग को खारिज कर रही थी | सरकार पर दबाव बनाने के लिए शंकराचार्य के नेतृत्व में भाड़ी भीड़ संसद का घेराव करने पहुच गयी | उस समय संसद चल रही थी | तमाम बड़े नेता संसद में मौजूद थे |

भीड़ ने कांग्रेस अध्यक्ष की गाडी और कार्यालय में आग लगा दी थी | भीड़ को रोकने के लिए सरकार ने आसू गैस और लाठी चार्ज का आदेश दिया लेकिन वो असफल रहे | तब घबरा कर इंदिरा गाँधी ने भीड़ पर गोली चलाने का आदेश दे दिया | भीड़ लाखों की संख्या में थी |

इतनी बड़ी भीड़ पर अगर गोली चलायी जाये तो कितने लोग मरे होंगे इसका हिसाब लगाना भी मुश्किल है | सरकारी आकड़ों के अनुसार 375 लोग मारे गए , लेकिन वहाँ के चास्म्दीदों का कहना है की कम से कम 5000 लोग मारे गए | सरकार ने तो अनगिनत लाशों और कई घायलों को भी ट्रक में भर भर के कही अनजान जगह भेज दिया और उन्हें कहा दफनाया गया या जला दिया आज तक कोई नहीं जानता |
पीएम इंदिरा गांधी ने गृह मंत्री, गुलजारीलाल नंदा पर आरोप लगाकर अपने हाथ धो लिए, जिन्होंने कानून व्यवस्था बनाए रखने में प्रशासन की विफलता के लिए तुरंत जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे दिया।

इस नरसंहार के विरोध में शंकराचार्य निरंजनदेव तीर्थ, स्वामी हरिहरानंद जी, जिन्हें व्यापक रूप से करपात्रीजी महाराज के नाम से जाना जाता है ने व्यापक उपवास शुरू किया और 166 दिनों तक उपवास पर रहे | बाद में नए गृह मंत्री उनके पास पहुचे और संसद के अगले सत्र में गौ हत्या विरोधी बिल लाने का आश्वासन दिया | लेकिन वो दिन कभी नहीं आया |

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